“तुम चाहते तो युद्ध रोक सकते थे” वासुदेव कृष्ण गांधारी के प्रश्न से सारा ब्रह्माण्ड कांप गया
श्रीकृष्ण का वह उत्तर, जिसने कलयुग तक को कांपने पर विवश कर दिया।
भूमिका: युद्ध समाप्त हुआ, पर पीड़ा शेष रही
कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों के उस भीषण संग्राम ने लाखों जीवन निगल लिए थे। धरती मां की कोख शवों से भरी थी और आकाश में विलाप गूंज रहा था।
गांधारी: जिसने आंखों पर पट्टी बांधी, पर सत्य जानती रहीं
हस्तिनापुर की महारानी गांधारी, जिन्होंने अपने पति धृतराष्ट्र के अंधेपन में सहभागी बनने के लिए स्वयं की आंखों पर पट्टी बांधी थी, आज सौ पुत्रों के विनाश के बीच खड़ी थीं।
मौन भी एक कर्म होता है
गांधारी सब जानती थीं, फिर भी चुप रहीं। यही मौन आगे चलकर महाविनाश का कारण बना।
वह प्रश्न जिसने युगों को झकझोर दिया
यह प्रश्न केवल एक मां का नहीं था। यह हर उस मनुष्य का प्रश्न है, जो अपने दुखों के लिए ईश्वर को दोष देता है।
गांधारी का श्राप और प्रकृति का कांपना
अपने तप, पतिव्रत और पीड़ा के बल पर गांधारी ने कृष्ण को श्राप दिया कि 36 वर्षों बाद उनका यदुवंश भी आपस में लड़कर नष्ट हो जाएगा।
कृष्ण की मुस्कान: जहां कथा दर्शन बन गई
जहां पांडव भयभीत थे, वहीं श्रीकृष्ण शांत मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा —
श्रीकृष्ण का उत्तर: युद्ध क्यों अनिवार्य था यह युद्ध 18 दिनों में नहीं हुआ
कृष्ण ने कहा कि यह युद्ध उस दिन आरंभ हो गया था, जब हस्तिनापुर में न्याय और अन्याय के बीच का भेद मिट गया।
- भीष्म की प्रतिज्ञा का अहंकार
- धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह
- गांधारी का मौन
द्रौपदी का चीर हरण: अंतिम चेतावनी
राजसभा में द्रौपदी का अपमान केवल एक स्त्री का नहीं, पूरे धर्म और मर्यादा का अपमान था।
“मैंने युद्ध नहीं कराया, कर्मों को फल तक पहुंचाया”
कृष्ण बोले — मैंने केवल उस फसल को कटने दिया, जिसके बीज तुम सबने अपने कर्मों से बोए थे।
---यदुवंश और श्राप का गूढ़ रहस्य
यदुवंश का विनाश पहले से निश्चित था। अधर्म, मदिरा और अहंकार वहां भी बढ़ चुका था।
सबसे कठोर सत्य: ईश्वर भी कर्म से बंधा है
कृष्ण ने स्पष्ट कहा —
यदि मेरे कर्मों का फल साधारण मृत्यु है, तो मैं उसे भी स्वीकार करता हूं।
कलयुग क्यों कांप गया?
क्योंकि यह घोषित हो गया कि —
- कोई चमत्कार नहीं बचाएगा
- कोई बहाना काम नहीं आएगा
- कर्म से ऊपर कोई नहीं
इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
- मौन भी एक कर्म है
- अधर्म का अंत अवश्य होता है
- कर्म ही पूजा है
- फल ही प्रसाद है
समापन
यह कथा केवल महाभारत की नहीं, हमारे जीवन की है।
❓ Frequently Asked Questions (FAQs)
🔹 गांधारी ने श्रीकृष्ण से युद्ध न रोकने का प्रश्न क्यों किया?
गांधारी ने अपने सौ पुत्रों के विनाश के बाद श्रीकृष्ण से यह प्रश्न किया क्योंकि वे उन्हें सर्वशक्तिमान मानती थीं और सोचती थीं कि वे चाहते तो महाभारत का युद्ध रोक सकते थे। यह प्रश्न एक मां के असहनीय दुख और संपूर्ण मानवता की पीड़ा का प्रतीक था।
🔹 श्रीकृष्ण ने युद्ध क्यों नहीं रोका?
श्रीकृष्ण के अनुसार यह युद्ध 18 दिनों में नहीं, बल्कि वर्षों पहले तब शुरू हो गया था जब हस्तिनापुर में अन्याय, अधर्म और मौन को स्वीकार कर लिया गया था। उन्होंने केवल कर्मों को उनके निश्चित फल तक पहुंचने दिया।
🔹 गांधारी का श्राप कृष्ण के लिए वरदान कैसे बना?
यदुवंश का विनाश पहले से ही निश्चित था क्योंकि वहां भी अधर्म, मदिरा और अहंकार बढ़ चुका था। गांधारी के श्राप ने श्रीकृष्ण को अपने ही हाथों से कुल-संहार करने की पीड़ा से मुक्त कर दिया, इसलिए वह श्राप उनके लिए वरदान बन गया।
🔹 क्या श्रीकृष्ण भी कर्म-फल से बंधे थे?
हाँ, श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा कि वे भी कर्म के सिद्धांत से ऊपर नहीं हैं। धर्म की स्थापना के लिए किए गए अपने कर्मों का फल उन्होंने पूरी सहजता और स्वीकार भाव से स्वीकार किया, यहाँ तक कि अपनी साधारण मृत्यु को भी।
🔹 द्रौपदी के चीर हरण को युद्ध का कारण क्यों माना गया?
द्रौपदी का चीर हरण केवल एक स्त्री का अपमान नहीं था, बल्कि धर्म, न्याय और मर्यादा का सार्वजनिक पतन था। जब समाज में धर्म नग्न हो जाता है, तब युद्ध अनिवार्य हो जाता है।
🔹 इस कथा से कलयुग के लिए क्या संदेश मिलता है?
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि कोई भी व्यक्ति — राजा हो या सामान्य मनुष्य, यहाँ तक कि ईश्वर का अवतार भी — अपने कर्मों के फल से नहीं बच सकता। कर्म ही पूजा है और फल ही प्रसाद।
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